TESTIMONIAL

DO SHABD - DR. VINAY

प्रस्तुत खण्ड में शंकर शेष के आठ नाटक संकलित हैं | इनने उनकी प्रौढ़ रचनाधर्मित का अनुभव होता हैं। लेखक धीरे - धीरे समय की सच्चाइयों से साक्षात्कार करता हुआ उन पद्धतियों पर भी विचार करने लगा है जिनमे वह एक विशेष प्रकार के सामाजिक स्वरुप तक पहुंचना चाहता है। शंकर शेष के विचार में " प्रत्येक आधुनिक लेखक 'प्रगतिशीलता' होता हैं ।" उनकी दृष्टि में " प्रगतिशीलता लेखक का सर्वप्रथम गुण है जो उसकी रचनाओं में झलकना चाहिए ; क्योकि अपने समय की समस्याओं से जूझते हुए वह जड़ता का विरोध करता है। इस प्रोसेस में वह किसी विचारधारा की मान्यता भी मान लेता है। मैं विचारधारा का अहसास जरुरी समझता हुँ, अनुकरण नहीं ।"

शंकर शेष के ये विचार उनके नाटकों में व्यक्त होते हुए देखे जा सकते है।'कालजयी' में लेखक प्रजातंत्र और राज्यतंत्र का संघर्ष चित्रित करता है । कालयजी अपनी शक्तियों को निरंकुश रूप देना चाहता है कि उसका विरोध होता है ।

चेहरे नाटक का यथार्थवादी शिल्प प्रगतिशीलता को एक दूसरे आयाम पर उभारता है | यहाँ पर सभी लोग अपनी-अपनी दुर्बलता छिपाते एक नाटकीय और बनावटी जीवन जीते है | पर एक घटना के होते -होते उनकी सारी बनावट सामने आ जाती है |सबके मुखौटे उनके चेहरों से उतर जाते है इस नाटक में लेखक की प्रगतिशीलता किसी विचारधारा का प्रतिपादन न करते हुए मनुष्य को जैसा वह है वैसा ही रहने देने की विवशता को व्यक्त करके, उससे बाहर आने का संकेत करती है | शंकर शेष ने अनेक बार जीवन की छोटी-छोटी किंतु निर्णायक स्तिथियों पर मारक प्रहार किया है | 'चेहरे और 'आधी रात के बाद में यह प्रहार व्यंग्य के माध्यम से होता है | 'चेहरे में लेखक धीरे-धीरे सबके चेहरों से मुखौटे उतारता है तो 'आधी रात के बाद में वह न्याय प्रणाली के एक दुर्बल पक्ष की ओर संकेत करते हुए उस सारे अपराध-जगत से सांकेतिक रूप में परिचय करता है, जिनकी नं0 दो की शक्ति के कारण सामान्य जन को न्याय नहीं मिल पता |

शंकर शेष की प्रगतिशीलता 'पोस्टर नाटक में आकर निर्विवाद रूप से मुखर हुए है | सदियों से चली आ रही जमींदारी के एक के आधार पर वे एक पुराने गांव की परिकल्पना करते है जहाँ का पटेल श्रमिकों को उनकी पूरी मजदूरी ही नहीं देता, उनकी मानवीय भावनाओं को भी अनेक पक्ष में प्रयुक्त करता है | किंतु, जब सामान्य

धमिकों में किसी कारण ('पोस्टर' के कारण) अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा होती हे तो शान्ति के सभी केंद्र उसे दबा देते हैं | पर, यहाँ लेखक पूरी तरह संकेत कर देता है की जागरूकता दबती नहीं तात्कालिक दबाव से केवल स्थगित होती है |

'पोस्टर' में रचना-प्रक्रिया का एक रूप भी सामने आता है | इसके दो संस्करण है | शंकर शेष ने प्रथम संस्करण के बाद संसोधन किया और दूसरा प्रारूप तैयार किया | हमने यहाँ केवल संशोधित प्रारूप ही दिया है |

'पोस्टर' को लेकर एक अन्य प्रकार का विवाद भी कुछ दिन चला की इसमें लेखक ने पूंजी और श्रम में संघर्ष दिखाकर भी श्रम की विजय नहीं दिखाई | अंत में चैती को पटेल के यहाँ जाना पड़ता है | हमारा विचार है की लेखक ने विचारधारा का आरोपण नहीं किया, उसने उन परिरिस्थित्यो में जितनी क्रांति या क्रांति का प्रारंभ हो सकता था, उतना दिखा दिया है |

इस प्रकार शंकर शेष अपनी रचनाओं कथा और जीवन तर्क की समनन्तरता में वास्तु का विकास करते हुए उसके निर्णयों की परिकल्पना की है | वे निरासा से परे है किन्तु अतिरिक्त और भावुक आशावादी नहीं है | उन्होंने यथार्थ की चुनौती स्वीकार करते हुए, यथार्थ का संस्कार भी किया |

संभवतः हम अनुभव करेंगे की शंकर शेष का लेखक व्यक्ति और समाज के अंधेरो से लड़ता है और वह अपनी हर लड़ाई को एक विश्वसनीय अंत देता है - कलागत अंत, फिर चाहे उस प्रक्रिया में जय स्थापित हो या पराजय | समाधान मिले या केवल प्रश्न खड़ा हो जाए !

DO SHABD