Life Sketch

संक्षिप्त परिचय

अक्टूबर १९३३ में बिलासपुर के शेष परिवार में शंकर जी का जन्म हुआ। पिता का नाम नागोराव विनायक राव शेष और माता का नाम सावित्री बाई शेष था। नागोराव शेष की दो पत्नियां थी। पहली जानकीबाई की मृत्यु के बाद सावित्रीबाई ने घर में प्रवेश किया। शंकर जी परिवार में चौथे क्रम पर थे। सबसे बड़े भाई बबनराव, बालाजीराव, तदुपरांत एक बहन आशा, जिसका ग्यारह वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उसके पश्चात् शंकर जी, फिर एक बहन, जिसकी अल्पायु में मृत्यु हो गई थी। उनसे छोटे दो भाई विष्णु और डॉक्टर गोपाल हैं। विश्णु सारी जायदाद की देखभाल करते हैं। डॉक्टर गोपाल ने एनशियंट हिस्ट्री में पी.एच.डी. की है और वे स्कूल में पढ़ाते हैं।

शंकर जी बचपन से कुशाग्र थे। शालेय जीवन से ही कविताएं करते थे। बिलासपुर में उन्होंने शालेय एवं इन्टरमीडिएट तक पढ़ाई की। तत्पश्चात् हिन्दी में बी.ए. ऑनर्स करने के लिए नागपुर के हिस्लॉप कॉलेज में प्रवेश लिया। नागपुर में अध्ययन के साथ अन्य दालान खुले। प्रमुख था आकाशवाणी। आकाशवाणी पर कविताएं तथा वार्ताएं प्रसारित होती थीं। वकृत्व में बचपन से कुशल थे। बी.ए. ऑनर्स करते ही उन्हें नागपुर महाविद्यालय, जो उस समय मॉरिस कहलाता था, लेक्चरर का पद मिला। अध्यापन के साथ-साथ काव्य लेखन एवं आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों के लिए कहानियों का लेखन प्रारंभ हुआ। साथ ही पी.एच.डी. के लिए डॉक्टर विनय मोहन शर्मा के मार्गदर्शन में कार्य शुरू किया।

उसी समय नाट्य प्रतियोगिता के लिए नाटक लिखा ‘मूर्तिकार’, जिसे मेडिकल कॉलेज के छात्रों ने खेला। निर्देशक थे के.के. मेहता। कॉलेज के लिए ‘विवाह मंडप’ भी लिखा। उस समय हिन्दी को राजभाषा घोषित किया था। हर क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग का आग्रह था। हिन्दी के हास्यास्पद प्रयोग समाज में दृष्टिगोचर हो रहे थे। उस विषय पर एक व्यंग्यात्मक नाटक लिखा ‘हिन्दी का भूत’। उस समय उनका ‘नागपुरी हिन्दी’ लेख भी बड़ा लोकप्रिय हुआ। यहीं उन्होंने ‘रत्नगर्भा’, ‘तिल का ताड़’ और ‘बेटों वाला बाप’ नाटक लिखे। वे मंचित हुए और लोकप्रिय भी हुए।

१९५८ में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ। नागपुर महाराष्ट्र का एक हिस्सा बना। शंकर जी ने मध्यप्रदेश में नौकरी करना बेहतर समझा। उन्हें रीवा में पदोन्नीत किया गया। नागपुर के इतने क्षेत्रों में फैला हुआ आदमी केवल रीवा के कॉलेज में सिमट गया। कविता जन्म लेती रही। कहानियां लिखी जाती रहीं। कालिदास समारोह में ‘शाकुंतल’ नाटक करने का अवसर मिला। एक ही वर्ष रहने के बाद पदोन्नीत हुई और शहडोल जाने का अवसर आया, नये सिरे से सब कुछ प्रारंभ हुआ। शहडोल में प्रारंभ में पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं था। छात्रों में पढ़ने के अलावा राजनीति में रूचि थी। यहां ‘एक और द्रोणाचार्य’ नाटक की पृष्टिभूमि मस्तिष्क में बनती गई। कुमार गंधर्व के शिश्य पंढरपुरकर और उनके शिष्य ढोलकिया के साथ संगीत की महफिलें सजने लगीं। कविताओं में गेयता आने लगी। ‘संगी चल भिलाई जावो’ यही की रचना है। शंकर जीके साथ कुछ ऐसा संयोग था कि तीन वर्ष से अधिक वे एक मकान में रहे नहीं। शहडोल के पाँच वर्ष के निवास में तीन मकान बदले गए। प्रोफेसर कॉलोनी के घर में एक नया आयाम जुड़ा। कॉलेज में नाटक होने लगे। उनका ‘हिन्दी का भूत’ और ‘तिल का ताड़’ मंचित हुआ।

चिंतनप्रिय व्यक्तित्व को किसी विस्मृत क्षितिज की खोज थी। उन्हें ऊब-सी होने लगी। आदिम जाति विकास विभाग में अनुसंधान अधिकारी के रूप में भोपाल में नियुक्ति हुई।

इसे विभाग ने अनुभव के क्षितिज को विस्तार दिया। आदिवासी, उनकी संस्कृति,रहन-सहन, भाषा से परिचय हुआ। लेखक का मन बातों को कहीं संग्रहित करता रहा। भोपाल में उन्हें बहुत पढ़ने को मिला। खजुराहो के शिल्पो ने कई प्रश्न जागृत किए। अंधी पत्नी की कहानी वाले चित्रपट न्दपज क्ंता ने अंधी विशाखा और शिवराज का निर्माण किया और नाटक बना ‘बिन बाती के दीप’।

नाटकों की प्रसिद्धि ने नौकरी में खलबल मचा दी। स्थानांतरण की बात उठी। काफी उठा पटक के बाद मध्य प्रदेश अकादमी में जगह बनी। अनुवाद कार्य करते करते बहुत पढ़ने का मौका मिला। विनायक चासकर ने ‘‘बिन बाती के दीप’’ को मंचित किया। कॉलेज के अनुभव मुखरित हुए ‘बंधन अपने अपने में’। खजुराहो के शिल्प देख उठे प्रश्नों ने ‘‘खजुराहो के शिल्पी’’ का आकार पाया। ‘‘फंदी’’ एक नया विषय था। इच्छा मरण का। एक समाचार पढ़ा था विदेश में कोई मरीज वर्षों से कोमा में है। उसने फंदी को आकार दिया। नाटक करने के लिए अभिनेता मुश्किल से मिलते थे। एक पात्र कई लोगों का अभिनय करने की कल्पना निर्माण हुई जो अभिनेता के लिए एक चुनौती था।

कॉलेज के अध्यापन के दौरान छात्रों के जो स्वानुभव, परानुभव को देखा, परखा, जिया। संवेदनशील मस्तिष्क में स्श्संग्रहित थे। उन्होंने आकार पाया ‘‘एक और द्रोणाचार्य’’ के रूप में। इस पहले तराशा बी.वी.कारंथ ने, जिन्होंने नाट्य कार्यशाला के दौरान इस नाटक को चुना था। तत्पश्चात् पंडित सत्यदेव दुबे ने अपनी कार्यशाला में तराशा। पुणें की कार्यशाला में नाटक परिष्कृत हुआ।

और फिर खुले मुंबई मायानगरी के द्वार। भारतीय स्टेट बैंक में नियुक्ति अपने आप में चुनौती थी। उसे बड़ी सफलता से निभाकर अपने राजभाषा विभाग के प्रमुख अधिकारी के पद को सार्थक बनाया। हिन्दी बैंकिंग शब्दकोश का निर्माण किया। परिश्रम शंकर जी के और किर्ति किसी और को मिली। मुंबई में निवास की समस्या और मानव समुद्र में रहकर एकाकीपन को जब देखा तो घरौंदा ने आकार पाया। नाटक पूरा करने के बाद उसे मित्रों को पढ़कर सुनाने की लेखक की आदत थी। भीमसेन खुराना ने सुना और फिल्म बनाने की योजना बनाई। ‘‘घरौंदा’’ पहला नाटक था जिसका मंचन बाद में हुआ, फिल्म पहले बनी।

नाटक का माहौल बनता गया। नाटक लिखे जाते रहे। रक्तबीज, अरे! मायावी सरोवर, पोस्टर, आधी रात के बाद। रक्तबीज में तथा अन्यत्र सुलभा देशपांडे की अभिनय कुशलता देखकर उनके लिए लिखा कोमल गांधार। ‘षोडशी गांधारी’ से वृद्धा गांधारी तक का जीवन काल नाटक में चित्रित था। सुलभा जी चुनौती स्वीकार न कर सकीं। अरविंद देशपांडे और शंकर जी का स्वप्न साकार न हो सका।

‘पोस्टर’ ने सफलता पाई थी। शशि कपूर एक और द्रोणाचार्य पर फिल्म बनाना चाहते थे। वी.शांताराम ने ‘खजुराहो का शिल्पी’ की पांडुलिपी तैयार करवा ली थी लेकिन नियति के कराल हाथों ने उन्हें उठा लिया। योजनाएं अधूरी रह गईं।

शंकर जी का वाचन व्यापक था। न केवल हिन्दी में वरन् मराठी, अंग्रेजी में उन्होंने बहुत पढ़ा। उनकी चिंतनशीलता उनके प्रत्येक नाटक में दिखाई देती है। नाटकों का हर पात्र पूरे चिंतन का परिपाक है। उनमें गुणग्राहयता कूट-कूट कर भरी थी। किसी के गुणों की सराहना कर उसके गुणों को विकसित करने में वे हर संभव सहायता करते थे।

स्वभाव से सरल और कर्मठ थे वे। मित्रता पर जान छिड़कते थे। बच्चों के लिए पिता कम मित्र अधिक थे। भारतीय स्टेट बैंक में जन संपर्क विभाग से प्रकाशित पत्रिका ‘कलींग’ का हिन्दी खंड वे ही संभालते थे।

इस प्रकार कुशल प्रशासक, सफल नाटककार, कवि एवं कथाकार के आयाम शंकर जी के व्यक्तित्व के पहलू थे। मात्र अड़तालीस वर्ष की आयु में निधन परिवार, नाटय जगत्, फिल्म जगत् और बैंक, सबके लिए क्षति है।